गंगेश्वर जीवन दर्शन — एक अमूल्य धरोहर
'गंगेश्वर जीवन दर्शन'
(मूल वंशावली)
कलि: शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापर:।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन्।।
चरैवेति। चरैवेति।।
जो सो रहा है वह कलि है, निद्रा से उठ बैठने वाला द्वापर है, उठकर खड़ा हो जाने वाला त्रेता है लेकिन जो चल पड़ता है, वह कृत अर्थात सतयुग/स्वर्णयुग बन जाता है। इसलिए गतिशील रहना है। चलते रहें, चलते रहें।।
मनुष्य कुल चार ऋणों से ग्रस्त है- देव ऋण, पितृऋण, ऋषिऋण और मनुष्य ऋण। इनके लिए क्रमश: देव यज्ञ, पितृयज्ञ, ज्ञानयज्ञ एवं मानव यज्ञ की आवश्यकता होती है। इनकी संपन्नता एक साधारण व्यक्ति भी न्यूनाधिक रूप से कर सके, इसको ध्यान में रखते हुए इस ग्रंथ का प्रणयन किया गया है।
उपरोक्त पुस्तक कुल दो खंडों में विभक्त है जिसमें प्रथम भाग में चातुर्वर्ण्य के लिए पाथेय एवं द्वितीय भाग में मां कामाख्या के अनन्य उपासक, सिकरवार कुल शिरोमणि, धामदेव राव जी के कुल-पुरोहित पराशर गोत्रीय 'गंगेश्वर उपाध्याय' के वंशजों का विशाल वटवृक्ष सदृश वंशावली है। सोलहवीं सदी में फतेहपुर सीकरी से चलकर गाजीपुर के सकराडीह स्थल पर आने के बाद पुरोहित और यजमान जो वर्तमान में उ० प्र०, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा आदि प्रांतों में फैले हैं, इनका इतिहास एवं पराशर गोत्रीय उपाध्याय जनों की वंशावली एवं गौरवशाली 'वंशगीत' है। इसके अतिरिक्त चौरासी के सक्रिय कार्यकर्ताओं का संपर्क सूत्र सहित चित्रांकन भी किया गया है।
प्रथम भाग में ही चौरासी कब से ? ब्राह्मणों की उत्पत्ति एवं इतिहास, लगभग 162 ऋषियों के नवरत्न, गायत्री, कामाख्या, गोमाता, कान्यकुब्ज व सरयूपारी ब्राह्मणों का भ्रम निवारण, कलियुग के संविधान निर्माता 'महर्षि पराशर' का पौराणिक इतिहास, सत्यवती के अमरपुत्र वेदव्यास, क्या करें क्या न करें, जीवन में यज्ञ का महत्व एवं यज्ञोपवीत का सचित्र निर्माण एवं महत्व पर भी संक्षेप में प्रकाश डाला गया है। श्रीरामचरितमानस माला जिसकी सहायता से कभी भी कामना परक संपुट लगाकर अहोरात्र मानस का परायण पाठ किया जा सकता है। तपोस्थली जमदग्नि (जमानियां) क्षेत्र का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व पर भी संक्षिप्त में प्रकाश डाला गया है। एक तरह से गागर में सागर भरने का अनूठा प्रयास। निश्चित रूप से चारों वर्णों के लिए यह संग्रहणीय है, क्योंकि -
'पूर्वजों को देवता बनाने वाली पुस्तकें अमर होती हैं।'
(प्लेटो)
सर्वत्र दृष्टि रखने वाला सृष्टा तथा विशिष्ट दृष्टि रखने वाला इतिहास ही है इसलिए इतिहास के माध्यम से ही पूर्वज और वंश अमरत्व को प्राप्त करते हैं। भगवान शिव ने पार्वती से कहा है-
'पुस्तकञ्च महेशानि यद्गृहे विद्यते सदा।
काश्यादीनि च तीर्थानि सर्वाणि तस्य मंदिरे।।'
(भूतशुद्धि तंत्र 17/6)
जय मां कामाख्या।
जय महर्षि पराशर।।
जय बाबा गंगेश्वर।।।
गहमर, गाजीपुर
पूज्य स्व० ओम प्रकाश उपाध्याय जी ने वंशवृक्ष संकलन का बीड़ा उठाया। अपने अथक परिश्रम एवं लगन से उन्होंने पराशर गोत्रीय गंगेश्वर वंश की 84 पीढ़ियों के विवरण को एकत्रित किया। उनके इस महान योगदान के बिना यह ग्रंथ संभव नहीं था।
अमौरा, गाजीपुर
डॉ० राम प्रकाश उपाध्याय जी ने स्व० ओम प्रकाश जी के अधूरे कार्य को आगे बढ़ाते हुए इस ग्रंथ को पूर्ण रूप दिया। उनके अथक परिश्रम, शोध एवं संकलन से यह 402 पृष्ठों का विस्तृत ग्रंथ तैयार हुआ जो अब पूरे वंश की धरोहर है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पुस्तक का नाम | गंगेश्वर जीवन दर्शन (मूल वंशावली) |
| ISBN | 978-81-979723-1-7 |
| लेखक | डॉ० राम प्रकाश उपाध्याय |
| मूल्य | ₹301 |
| पृष्ठ संख्या | 402 |
| संस्करण | प्रथम संस्करण, 2081 |
| प्रकाशक | नवीन प्रकाशन, कोलकाता |
| मुद्रक | YEXEL Print Solution, गोरखपुर |
| गोत्र | पराशर |
| वंश | गंगेश्वर वंशीय चतुरशीति: (चौरासी) |
"गंगेश्वर जीवन दर्शन हमारी महान सनातन परम्परा की एक अमूल्य निधि है। इस वंशावली ग्रंथ के माध्यम से पराशर गोत्रीय गंगेश्वर वंश की 84 पीढ़ियों की गौरवगाथा को संरक्षित किया गया है। यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है। लेखक एवं उनके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं।"
"यह ग्रंथ न केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे सनातन समाज की सांस्कृतिक विरासत को संजोने का प्रयास है। डॉ० उपाध्याय जी का यह अथक परिश्रम आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा। इस श्रेष्ठ कार्य के लिए हार्दिक अभिनंदन।"